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आम भारतीय स्त्री

मनमीत सोनी
मुझे मंदी आंच पर सीझ रही
ठीक-ठाक मसाले के छौक वाली
पतली स्वादिष्ट दाल का ख़याल आता है –
जिसमें एक बार रोटी डुबा ली
तो आप तीन के बजाय पांच फुलके खा जाएंगे
और अगर चावल मिला लिए
तो पेट तो भर जाएगा
मगर जीभ पुकारेगी :
बस एक निवाला और!
कभी गौर से देखिये
सुबह-सुबह
नींद से जगती हुई भारतीय गृहिणी को
वह कैसे चोटी बाँधती है
वह कैसे जूड़ा बनाती है
वह कैसे दुपट्टा संभालती है
वह कैसे ठीक करती है साड़ी की सिलवटें
दर्पण से उतारती है बिंदिया
माथे के बीचों बीच लगाती है
चाय चढ़ाती है गैस पर
गुनगुनाती है कोई गाना
जगाती है सबको –
उस सौभाग्यशाली नींद का क्या कहना
जो उड़ती है उसकी मीठी आवाज़ से :
सुबह हो गई / अब तो उठ जाइये!
वह सुबह पहले उठते ही नहा लेती है
एक सादी साड़ी
एक बिना मैचिंग का ब्लाउज़
एक घिसी हुई घर की हवाई चप्पल या रोएं उठे मोज़े –
और वह तैयार है
आपको तैयार करके दफ्तर भेजने के लिए
जहाँ वह भी जा सकती थी
मगर कुछ ऐसी वजहों ने उसे रोक लिया
जिनकी तफ़सील कविता में बयान नहीं हो सकती!
कोई मेकअप नहीं है उसके चेहरे पर
उसका मेकअप बस इतना है कि वह नहाई हुई है
उसकी आँखों में न काजल है
उसके गालों पर न फाउंडेशन है
उसके होंठों पर न लिप ग्लाउस है
उसके गले में एक सोने का पतला डोरा है
या कभी कभी तो सिर्फ़ एक काला धागा
उसकी फूली हुई गर्दन की नस को
चूमने की इच्छा होती है
और यह बात
मैं वासना में धंस कर नहीं
बल्कि पूजा-पाठ में डूबकर कह रहा हूँ!
पूरी दोपहर
वह एक इंतज़ार में डूबी रहती है
बच्चे स्कूल से लौटते हैं
उसकी पुच्ची लेते हैं
और उसका मेकअप हो जाता है
वह बच्चों के एक चुम्बन से संवर जाती है :
हाय राम!
तब क्या होगा
जब साजन लौटेंगे शाम को घर
दिन भर की धूल लिए शर्ट और पेंट पर
पसीने में नहाए
अजीब-सी बू में लिपटे हुए
लेकिन इस बू को भी वह ख़ुशबू कहती है –
वह अकेले में चूमती है
पति के शर्ट की कॉलर
उसे सूंघती है वाशिंग मशीन से निकाल कर
पति लोग जान ही नहीं पाते
उनकी शर्ट की कोलरों पर
होंठों के पारदर्शी चुम्बन भी चलते हैं उनके साथ-
मनोचिकत्सक कहते हैं :
इतना सब कुछ दबा के रखने के कारण ही
बीमार होती हैं भारतीय स्त्रियां!
देर रात
जब साजन के सीने से उठती है भाप
और सजनी की छाती में मचलता है समुद्र
कितनी जोरदार बारिश होती है
इतनी सावधानी से
टूट कर बरसता है पानी
कि बच्चे जागने नहीं पाते :
सो जाते हैं साजन थक कर
एक संदली आग में
और सुलगती रहती है सजनी
कि काश कुछ और देर रहते साजन बाँहों में!
चुम्बनों
स्पर्शों
आलिंगनों
और तारीफों से सजती है एक भारतीय स्त्री
ब्यूटी पार्लर की जगह बहुत बाद में आती है –
हम अपराध करते हैं :
अगर नहीं छूते
एक स्त्री का हाथ
नहीं चूमते उसका माथा
नहीं कसते उसे बाँहों में
नहीं करते उसकी तारीफ़ :
कि खाना बहुत अच्छा बनाया आज!
चेहरों से मत आँकिये
आम भारतीय स्त्रियों को
फिर तो आपको अधिकतर
टेढ़े दाँत
बहुत चिपके या बहुत फूले स्तन
बहुत मोटी थुलथुल जांघे
बहुत बेडौल नितम्ब ही हाथ आएँगे
हृदयों में उतरिये भारतीय स्त्रियों के
उनके दाँतों में दबी है
साड़ी पर लगाने की सेफ्टी पिन
उनके स्तनों में छलकता है
अनाथ बच्चों तक के लिए दूध
उनकी जांघों में
दौड़ती हैं घरेलू काम निबटाने की बिजलीनुमा शक्ति
उनके नितंबों ने
इस धरती को पेपरवेट की तरह दबा रखा है
वे
मूढ़े पर बैठी हैं
और चबा रही हैं काठिया सुपारी!
आम भारतीय स्त्रियां ही
इस दुनिया का पहला और आख़िरी अजूबा हैं –
उन्हें “यूनिसेफ़” नहीं
उन्हें हमारा प्यार बचाएगा!
इतनी भोली स्त्रियां हैं
कि बस एक उदाहरण से समझाता हूँ :
कि पिछले दिनों मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि आप इतनी किताबें क्यों खरीदते हैं जबकि इनमें से देखकर तो आप कुछ भी नहीं लिखते?
और फिर
इस सरल प्रश्न के बाद
मैं हँसा
और मेरे हँसने पर वह रुआंसी हो गई :
मैंने
उसके पैरों में रख दी
एक लिखी जा रही कविता
जैसे यह कविता रखता हूँ
उन करोड़ों पैरों में
जिनकी उड़ती हुई धूल से लिपटा है यह कवि मनमीत
आम भारतीय स्त्रियो!
तुम कौन हो?
तुम कहाँ से आई हो?
तुम इतनी श्रद्धा
इतना विश्वास
इतना प्रेम
इतनी करुणा क्यों हो?
तुम कभी कहीं लुप्त तो नहीं जाओगी?
भारत!
मेरे प्रिय भारत!
न्यू ईयर पर
शराब पीकर घर लौटी अपनी बच्ची को
जो दुर्भाग्यशाली स्त्री छीटे मार कर जगा रही है –
ऐसी ही किसी स्त्री का
बेटा बनाना मुझे
हर जन्म में हर बार!