जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों

जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों।
दुनिया
सफल पुरुषों की बात करती है
और सफल पुरुषों की आत्मप्रवंचना
अभिप्रेरणा बना कर बेची जाती है।
मैं
तुम्हारी बात करूंगा, मित्रों,
जीवन ने जिन्हें
किश्तों में दिया जीवन,
और एक-एक किश्त पर वसूला चक्रवृद्धि ब्याज
जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों,
पुरुष जीवन की
एक ही परीक्षा थी — “रोजगार”,
वही थी पहचान,
उसी पर खड़ा होना था आत्मविश्वास,
और आत्मविश्वास के बाद के तमाम पौरुषीय पराक्रम।
जीवन की गुत्थी अब उलझ गई है तुमसे,
तुम इस द्वार से उस द्वार
कभी मन्नतें मांगते हो,
कभी रोजगार,
कभी घर से लड़कर निकलते हो,
कभी चुपचाप,
कभी कुछ खाकर निकलते हो,
कभी कुछ कहकर।
जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों,
बाहर की विशाल दुनिया बेहद संकीर्ण है,
और छोटे-छोटे हमारे घर
अंतहीन ठंडे कुएँ,
जिनमें रोज डालते हो तुम अग्नि,
और रोज राख हो जाती है।
परीक्षा ऐसी भी क्या हुई
कि अग्नि भरने के अपराध में तुम
प्रमथ्यु हुए जाते हो,
रोज नुचवाते हो अपना मांस
और रोज घर आकर सहलाते हो खुद को।
मांस-रहित ढाँचे कितना जूझ सकते हैं आखिर,
कितना लड़ सकते हैं,
कितना सह सकते हैं दर्द,
पूछ तो लो किसी दिन खुद से।
जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों,
पुरुष होने की स्वच्छंदता
जो जन्म से साथ लाए थे तुम,
वह जी ही नहीं पाए,
तुम पर कैसे लगा दूँ दोष, किसी वाद में बहकर।
तुम प्रेमचंद की कहानियों के,
गोर्की के उपन्यासों के
वह किरदार हो
जिनके कंधे हैं, चेहरा नहीं है,
जो मेहनत करते हैं, पहचान नहीं रखते,
जो विदा होते हैं तो रुदन नहीं होता,
जो जिंदा तो होते हैं, मगर किसी के जेहन में नहीं होते।
जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों,
हार जाओ
हार जाने की सार्वजनिक घोषणा कर दो
बोल दो
नहीं टूटते जीवन के चक्रव्यूह
तोड़ दो छद्म आदर्शवाद की जकड़नें
विदा कह दो प्रतीक रूपक सभ्य मित्रों को
बोल दो किसी दिन कफन के
लापरवाह घीसू और माधव की तरह,
कि किसी भारी रात में हल्के होकर
आसमान में तारे देखने की तुम्हारी इच्छा होती है।
इच्छाओं को भीतर दफन करते,
ठंडे कुएँ भरते
प्रमत्यु की गति को प्राप्त होते
कब तक रिसते रहोगे
जीवन से हारे मेरे पुरुष मित्रों।
वीरेंदर भाटिया