मन के नंगे अँधियारे में, स्वाद बदलने आते हैं

देह बेचतीं हम वैश्याएँ, पुरुष मचलने आते हैं।
मन के नंगे अँधियारे में, स्वाद बदलने आते हैं॥
यूँ तो हम भी नहीं रूपसी, केवल काम उतारू हैं।
किसे विवशता ज्ञात हमारी, क्यों ऐसी बाजारू हैं॥
जगत हमें झूठा गरियाता, चेहरे नहीं छिपातीं हम।
देह वही बस रूप अलग है, पुरुषों को भरमातीं हम॥
जग का जूठा नमक चाटने, घर को छलने आते हैं।
मन के नंगे अँधियारे में, स्वाद बदलने आते हैं ॥1
घृणित वासना की ज्वालाएँ, स्वयं समेटे बैठी हैं।
भद्रजनों की अधमाई सँग, पाप लपेटे बैठी हैं॥
जाने कितने भेद मौन हैं, पतित अपावन आँचल में।
धर्म-अर्थ के मठाधीश भी, डूबे बंकिम काजल में॥
पूजित देव असुरता में खुद, क्योंकर ढलने आते हैं?
मन के नंगे अँधियारे में, स्वाद बदलने आते हैं ॥2
आवारा तूफान थमे हैं, मैले – कुचले बिस्तर पर।
कर्ज हमारा भी कुछ होगा,कहीं शान्ति के भी स्वर पर॥
नग्न सत्य हम अगर न होतीं, देहरियाँ तक जल जातीं।
कामी भँवरों के हाथों नित, भोली कलियाँ मल जातीं॥
बदन हमारा नहीं स्वयं को, कालिख मलने आते हैं।
मन के नंगे अँधियारे में, स्वाद बदलने आते हैं ॥3
जिन आँखों में काम भड़कता, स्वागत उनका आएँ तो।
देह उजाड़े नहीं किसी की, सारी आग बुझाएँ तो ॥
किन्तु रोक दो बर्बरताएँ, अब तो बिटिया जीने दो।
यत्र – तत्र मत लार उछालो, आधी दुनिया जीने दो॥
ऐसा हो तो दुःख न होगा, नर क्यों गलने आते हैं।
मन के नंगे अँधियारे में, स्वाद बदलने आते हैं ॥4
कौशल “कौशलेन्द्र” ✍️