डा० लोहिया राजनीति के समर्थ उत्तराधिकारी , नेताजी सुभाष चन्द्र के निकट सहयोगी, आजाद हिंद फौज में सेनानी, समाजवादी आंदोलन के योद्धा कैप्टन अब्बास अली की आज जयंती है। कैप्टन अब्बास अली आज जीवित होते तो 105 बरस के होते। वह 94 साल की उम्र में हम सबको अलविदा कह गए। कप्तान साहेब एक बेहतरीन इन्सान थे। आज़ाद हिन्द फौज का यह कप्तान जब अपनी बुलंदी पर था तो उसने किसी तरह का समझौता नहीं किया और यह बुलंदी उनकी ज़िंदगी में हमेशा बनी रही।
इस बहादुर इंसान की ज़िंदगी को कलमबंद होना चाहिए ताकि आने वाली नस्लों को मालूम रहे कि खुर्जा कस्बे के पास के गाँव कलंदर गढ़ी में एक ऐसा इंसान भी रहता था जिसने मानवीय आचरण की हर बुलंदी को नापा था।अब्बास अली को एक ऐसे इंसान के रूप में याद किया जाना चाहिए जिसने कभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी और उसी रास्ते पर चले जिसको सही समझते रहे। शायद इसी लिए उन्होंने नौजवानों से अपील की थी। अब्बास अली को नौजवान पीढ़ी से बहुत उम्मीदें थीं।
आपने फरमाया था, “बचपन से ही अपने इस अजीम मुल्क को आजाद व खुशहाल देखने की तमन्ना थी, जिसमें जाति-बिरादरी, मजहब व जबान या रंग के नाम पर किसी तरह का शोषण न हो। जहां हर हिंदुस्तानी सिर ऊंचा करके चल सके। जहां अमीर-गरीब के नाम पर कोई भेद-भाव न हो। हमारा पांच हजार साल का इतिहास जाति-मजहब के नाम पर शोषण का इतिहास रहा है। अपनी जिंदगी में अपनी आँखों के सामने अपने इस अजीम मुल्क को आजाद होते हुए देखने की ख्वाहिश तो पूरी हो गई, लेकिन अब भी समाज में गैर बराबरी, भ्रष्टाचार, ज़ुल्म-ज्यादती व फिरकापरस्ती का जो नासूर फैला हुआ है, उसे देखकर बेहद तकलीफ होती है। दोस्तों, उम्र के इस पड़ाव पर हम तो चिराग-ए-सहरी (सुबह का चिराग) हैं, न जाने कब बुझ जाएं। आपसे और आने वाली नस्लों से यही गुजारिश और उम्मीद है कि सच्चाई व ईमानदारी का जो रास्ता हमने अपने बुजुर्गों से सीखा, उसकी मशाल अब तुम्हारे हाथों में है। इस मशाल को कभी बुझने मत देना।”
अब्बास अली जीवन भर इंसानी बुलंदी और सामाजिक बराबरी की लडाई लड़ते रहे। उनका अपना परिवार राजपूतों की उस परम्परा से ताल्लुक रखता था जिसकी जड़ें अयोध्या के राजा रामचंद्र तक जाती थीं। उनका पालन पोषण सामन्ती माहौल में हुआ था। उनके अपने गाँव कलंदर गढ़ी में भी बहुत अधिक खेती थी लेकिन उन्होंने समाजवाद की लड़ाई का मन बनाया और आखिर तक उसी मुहिम में शामिल रहे। लेकिन उनकी राजनीतिक ज़िंदगी में सामन्ती संस्कारों के लिए कोई जगह नहीं थी।
आज ऐसे कप्तान की यौमे पैदाइश है जिनकी एक धमक ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। जब सदन पहुंचे तो विपक्षियों की बोलती बंद कर दी। जिनके इंकलाबी नारों की गूंज आज भी सड़क से सदन तक सुनाई देती है। ऐसी पुण्य आत्मा की स्मृतियों को कोटि कोटि नमन।”

