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लोकसभा का पहला नेता प्रतिपक्ष डॉ रामसुभग सिंह

डॉ. राम सुभग सिंह इन्हें भारतीय संसद का पहला मान्यता प्राप्त ‘नेता प्रतिपक्ष’ होने का गौरव प्राप्त है। वे उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में भी रहे और बाद में इंदिरा गांधी की सत्ता को सीधी चुनौती भी दी। उन्हें संसद में उनकी दहाड़ और बेबाक तर्कों के लिए ‘शेर-ए-पार्लियामेंट’ कहा जाता था।
वे ठेठ बिहारी  किसान पुत्र थे, लेकिन उन्होंने अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की थी। धोती-कुर्ता पहनने वाला यह ‘डॉक्टर’ जब अंग्रेजी में बोलता था, तो संसद सन्न रह जाती थी।
यहाँ उस संसदीय योद्धा और बक्सर के गौरव के बारे में एक पोस्ट है।
डॉ. राम सुभग सिंह: वो पहली विपक्षी कुर्सी, वो कांग्रेस का विभाजन और संसद की दहाड़!! 1969 से पहले लोकसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ का कोई औपचारिक पद नहीं था। लेकिन जब कांग्रेस टूटी, तो राम सुभग सिंह ने वह इतिहास रचा।
डॉ. साहब की वो बातें जो उन्हें ‘खास’ बनाती हैं:

पहला नेता प्रतिपक्ष

जब 1969 में राष्ट्रपति के निर्वाचन पर  कांग्रेस दो फाड़ हुई (कांग्रेस-ओ और कांग्रेस-आर), तब  राम सुभग सिंह ‘सिंडीकेट’ (पुराने नेताओं) के साथ चले गए।
वे 60 सांसदों के साथ विपक्ष में बैठे और स्वतंत्र भारत के पहले आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष बने। उन्होंने इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नेतृत्व किया।

विद्वान किसान

वे भोजपुर (आरा) के एक साधारण किसान परिवार से थे, लेकिन पढ़ाई में बहुत तेज थे।
उन्होंने मिसौरी यूनिवर्सिटी अमेरिका  से पत्रकारिता में पीएचडी की थी।
वे अक्सर संसद में कहते थे— “मैं एक किसान हूं और किसान की भाषा भी जानता हूं और विज्ञान की भाषा भी।”

रेल मंत्री और कृषि मंत्री

विपक्ष में जाने से पहले, वे इंदिरा गांधी और शास्त्री जी की सरकारों में रेल मंत्री और कृषि राज्य मंत्री रहे।
कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने 1960 के दशक में अकाल के दौरान अमेरिकी मदद (पीएल-480) के वितरण में अहम भूमिका निभाई थी।

संसदीय शेर

उनका कद ऊंचा और आवाज भारी थी।
जब वे संसद में खड़े होते थे, तो सत्ता पक्ष के पसीने छूट जाते थे। वे नियमों के पक्के थे और किसी भी मंत्री को गलत बयानी करने पर तुरंत पकड़ लेते थे। इसीलिए उन्हें ‘शेर-ए-पार्लियामेंट’ कहा जाता था।
वे बिहार की ‘बौद्धिक ताकत’ थे।