मशहूर पर्यावरणविद, शिक्षाविद और नवाचार क्रांति के आदर्श सोनम वांगचुक इन दिनों जेल में हैं। जेल के बाहर उन्होंने अपनी प्रतिभा और अपनी कार्यकुशलता से जो बन पड़ा वह किया। उन्हें मैग्सेसे मिला और थ्री इडियट में आमिर खान ने उनसे प्रेरित होकर लगभग उन्हें ही अभिनीत करने की कोशिश की।
सोनम वांगचुक जब सत्ता के लिए कोई परेशानी नहीं थे तब सत्ता के लाडले थे और उन सबके लाडले थे जिन्हें उनका किरदार पसंद आ रहा था। पसंद करने वालों का अपना गणित होता है। हमे अक्सर लगता है कि कोई भी किसी को उसके किरदार के लिए पसंद करता है। लेकिन ऐसा नहीं है। लोग अपने गणित के हिसाब से ही किसी दूसरे को पसंद करते हैं या फिर अपनी विचारधारा के सांचे में फिट आने पर ही उसे पसंद करते हैं। आज आमिर खान भी कुछ नहीं बोल सकते, सत्ता से नजदीकी रखने वाले भी और वे तो कत्तई नहीं बोल सकते जिनकी विचारधारा में सोनम फिट नहीं आते। हालांकि सोनम का काम उनकी या किसी की भी विचारधारा से बड़ा है, उनका मयार इतना बड़ा है कि कोई भी मुल्क ऐसी प्यारी शख्शियत को अपने बीच पाकर खुश और गौरवान्वित महसूस करेगा।
लेकिन भारत का बुखार इन दिनों कुछ अलग चल रहा है। सत्ता को अपनी सत्ता अक्षुण्ण रखने के लिए किसी भी विरोध या आंदोलन को उठने नहीं देना है। आंदोलन के अगुआ का कद बड़ा है तो उसका कद छोटा करने की कोशिश की जाती है ताकि देश की डरी हुई अवाम सच में ऐसा मान लें कि हां, जो उसके बारे में सत्ता कह रही है वही सत्य है।
तमाम ऊहापोह और सत्ता के छुटपन के चलते सोनम वांगचुक को अंततः जोधपुर जेल में जाना पड़ा।
सोनम वांगचुक आखिरकार एक ऐसी जगह पहुंच गए जहां उन्हें बहुत पहले जाना चाहिए था। देश की न्याय व्यवस्था का भी शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने सोनम को जेल में रहने के लिए कुछ माह की मोहलत अता फरमाई। जेल एक ऐसी जगह है जहां से सिर्फ बनावटी और नकारात्मक खबरें ही बाहर आती हैं। जहां सिर्फ अपराधी हैं जहां मनुष्यता के कत्ल के आरोप में लोग बंद हैं। सोनम वांगचुक को उन लोगों के बीच धकेल दिया गया है। मुझे लगता है, बाहर के लोगों को सोनम वांगचुक की जरूरत नहीं थी। सोनम वांगचुक की असल जरूरत उन लोगों को ही थी जो देश की न्याय व्यवस्था की धीमी चक्की में इस तरह पिस रहे हैं कि उनका पिसना रिसना किसी को नजर नहीं आता। देश की सत्ता को यही प्रयोग करना चाहिए कि तमाम उन लोगों को उठाकर जेल में डाल देना चाहिए जो बाहर कुछ न कुछ रचनात्मक कर रहे हैं। उनकी रचनात्मकता अब बाहर के लोगों के लिए लाभकारी नहीं रही। लेकिन जेल में ऐसा कोई एक भी व्यक्ति आता है तो जेल के लोग उसके प्रति बेहद आत्मीय भाव रखते हैं। वे उस व्यक्ति से कुछ सीखना चाहते हैं, उस व्यक्ति को अपने बीच पाकर वे उसके कृतित्व के साथ जुड़ते हैं। हम बाहर के लोग किसी भी रचनात्मक व्यक्ति के कृतित्व के साथ जुड़ते ही नहीं। सोनम वांगचुक जेल में क्या करेंगे। क्या करते होंगे। जेल का मैनुअल उन्हें अन्य कैदियों या बंदियों के साथ मिलने की अनुमति देता है या नहीं। वहां किसी बड़ी शख्शियत की सुरक्षा का मामला सबसे बड़ा होता होगा। इन सब सवालों के बीच उनकी पत्नी का कहना है कि सोनम वांगचुक वहां कुछ लोगों को पढ़ा रहे हैं, नवाचार की बातें कर रहे हैं, किताबें पढ़ते हैं और लोगों को भी पढ़वाते हैं।
जहां सोनम वांगचुक हैं वहां अन्य बैरकों के लोग सोनम से न भी मिल सकें लेकिन वे उनके वहां होने भर से ही प्रभावित होंगे और सोनम को जानने की कोशिश करेंगे। मेरा दावा है कि सोनम जेल से बाहर आकर खुद कहेंगे कि जेल के भीतर काम करने की संभावनाएं सबसे अधिक है क्योंकि वहां मनुष्यता के कातिल नहीं बल्कि स्वयं सिस्टम द्वारा मनुष्यता कुचली जा रही है।

साभार-वीरेंदर भाटिया

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