रमाशंकर सिंह की फेसबुक वॉल से-ऊधो यह मुर्दों का देश

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कवि बोधिसत्व बनारस को ही मुर्दों का टीला कह रहे थे ।
इस देश ने कब बगावत की ?
और जिन्होंने की उनका साथ देने वाले मुट्ठी भर न थे । 1857 की अमर कहानी गाते रहो पर तब भी साथ नहीं दिया , करोडों की आबादी में महज़ कुछ हजार पूरे देश में और वह भी तब जबकि कुछ राजा रानी नवाब भी निकले चाहे जिस भी कारण से । महात्मा गांधी ही सत्याग्रहियों की संख्या लाखों में पहुंचा पाये । जो राजा हो जाये उसी के संग ।
“ कोऊ नृप होइ हमें का हानी “
राजा नवाब पंडित पुरोहित मौलाना , सुलतान मुग़ल अंग्रेज पुर्तगाली फ़्रेंच , नेहरू इंदिरा अटल राव समेत सारे राजा निष्कंटक राज कर स्मृतिशेष हुये !
प्रतिपक्षी को देशद्रोही समान बताने का क्रम जिन्होनें १९७४ में शुरु किया वे खुद ही आज देशद्रोही घोषित हो चुके हैं । इतिहास चक्र किसी को नहीं छोड़ेगा , कल वालों को नहीं छोड़ा तो आज वाले कैसे छोड़ दिये जायेंगे?
बड़े बड़े तीसमार खॉं महाराजा चक्रवर्ती बादशाहों की दुर्गति इसी इतिहास ने ऐसी की कि अब नाम लेवा कोई नहीं है और उनकी औलादें कहॉं कहॉं मुजरा करती फिर रही हैं ।
जनमानस का मनोविज्ञान और कायर मानसिकता का गहन अध्ययन किया होगा कि अब ११ बरस से चूँ नहीं कर रहा देश जबकि निजी रूप में फट पड़ते हैं अगर बात होने लगे तो ।
बुद्धिजीवी, कलाकार ,शिक्षक , व्यापारी , बाबा साधु , छात्र , युवा, मजदूर , राजनेता, कार्यकर्ता, पत्रकार सब के सब इतने भीरु और कायर कि सच्ची बात कहने में डरें ।
और डंका ‘ सत्यमेव जयते ‘ का । कथनी करनी में आकाश पाताल का अंतर !
लोहिया का सूत्र वाक्य “ – जिंदा कौमें पॉंच साल इंतजार नहीं किया करतीं “ हम खूब दोहराते लिखते सुनाते रहे पर मुर्दे कभी नहीं उठे !
भारत के अधिकांश देवता जननेता जवान उम्र में ही अपना उत्कर्ष दिखा रुखसत होते रहे । कवि लेखकों ने कभी प्रौढ से वृद्ध होते देवों की महागाथा नहीं लिखी । विवेकानंद भगत सिंह रानी लक्ष्मीबाई जैसे असंख्य प्रेरणापुंज भी जवान उम्र में ही चले गये ।
“ बूढ़ी चीलें उम्र भर अठखेलियाँ करती रहीं ।।
हमारा मीरे कारवां तो अक्सर जवाँ मारा गया ।।”
मीरे कारवां मरते गये और यह देश कभी जन बगावत नहीं सीख पाया । साज़िशों से ही हमेशा राजपाट जरूर बदले गये । युवजन बूढ़ों से बदतर हो गये हैं । स्त्रियाँ लड़कियां रोज़ दुराचार बलात्कार की घटनायें सहतीं हैं पर बलात्कारी उनके हाथों कब मारे गये ? द्रौपदी जैसा बदला लेने परिवार के पुरुष भी कहॉं बिलाय गये , डर से ! संगठित मज़दूर तनख़्वाह बढ़वाकर निज़ाम के गीत गाता है और महीने का सौ रूपया चंदा बतौर अपने नेता की ओर फैंक देता है । असंगठित मुफलिस ग़रीब पाँच किलो मुफ्त अनाज में निहाल है ।