पुण्यतिथि पर विशेष-जन जन के जनेश्वर

पूर्व केन्द्रीय मंत्री समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र
आज समाजवादी आंदोलन की प्रखर आवाज़ रहे जनेश्वर मिश्र  जी की पुण्यतिथि है। कुछ समाजवादी नेता और तथाकथित बौद्धिक चिन्तक जनेश्वर जी को ‘छोटे लोहिया’ के नाम से सम्बोधित करते है। जैंसा कि मैने डॉ लोहिया को पढ़ा, समझा और जाना है, पूरे समाजवादी आंदोलन में कोई भी उनकी जगह नहीं ले सकता। खैर बात छोटे लोहिया के सम्बोधन की हो रही है, तो आपको बता दें लोहिया जी के जीवनकाल में ऐेसा दुःसाहस कोई व्यक्ति नहीं कर सकता था।
कुछ दशक पहले जो गलती महात्मा गांधी ने की थी वही गलती मुलायम सिंह यादव जी ने दोहरा दी। महात्मा गांधी ने नेहरू की बिटिया इंदिरा को ‘गांधी’ उपनाम देकर एक नई विचारधारा का अभ्युदय किया, वहीं कुछ जोशीले समाजवादियों ने जनेश्वर जी को ‘छोटे लोहिया’ कहकर एक नई विचारधारा का स्वांग रचना शुरू कर दिया है। जिसका परिणाम यह हुआ कि गांधी और लोहिया की विचारधारा का लगातार ह्रास शुरू हो गया। राजनैतिक लोग सिर्फ नाम का सहारा लेकर गांधीवादी और समाजवादी बनने का स्वांग रचते रहे और सत्ता में बने रहे, जबकि वैचारिक रूप इन लोगों ने गांधी और लोहिया को तिलांजलि देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जिस सादगी से गांधी और लोहिया ने अपना जीवन जिया वह इन कांग्रेसियों और समाजवादियों को नहीं भाता। यही वजह है कि आमजन से गांधी और लोहिया तो दूर हुए ही साथ ही उनके समकालीन नेताओं की वैचारिकी से दूर हो गई। आज सिर्फ वह जयन्ती और पुण्यतिथि पर भाषणों में याद किए जाते है, अर्न्तमन में कुछ और ही है।
वहीं वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में भाजपा ने अपने पुरखों, राजनैतिक पुरोधाओं और राष्ट्रवादी विचारधारा को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा बल्कि अमलीजामा भी पहनाया। चाहे सत्ता में रहें हों या विपक्ष में उन्होंने कभी विचारधारा से समझौता नही किया। इनका न कोई छोटे सावरकर है, न कोई छोटे अटल। सिर्फ विचारधारा की सर्वाेपरि है।
आज जनेश्वर जी की पुण्यतिथि है। जनेश्वर जी विलक्षण ऊर्जा और ताकत के साथ, लोकसभा के अंदर और बाहर, आम आदमी के लिए लड़े। वह हमेशा राजनीति में डॉ लोहिया के साथ मिलकर समाजवादी आंदोलन को आगे लेकर चले। छोटे छोटे नारों के ज़रिए समाजवादी सिद्धान्तो को जनता तक पहुँचाया। जिनसे लोहिया जी की वैचारिक मान्यताओं के बीच एक अटूट रिश्ता, श्रृंखला या तारतम्य की तलाश की जा सकती हैं। लेकिन लोहिया के बताये रास्ते पर चलने वाला आज कोई दल या संगठन नहीं है। लोहिया जी का कहना था कि विचार की सफलता के लिए कर्म और संघर्षशीलता दोनों का मिश्रण जरूरी है। जिसे हम कहीं पीछे छोड़कर आगे बढ़ चलें है।
आज जनेश्वर जी को सिर्फ याद ही नहीं करना है बल्कि उनकी राजनीति के मौलिक विचारों-बिंदुओं की बुनियाद पर खड़ी समाजवाद की परिकल्पना को साकार भी करना है। जनेश्वर जी और समाजवादी अन्दोलन से जुड़े योद्धाओं और समाजवादी विचारधारा पर खूब काम भी करना है। ताकि आने वाली नस्ल को हम अपने पुरखों की विचारधारा जनमन तक पहुँचा सके।