मृत्यु पर्यंत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की की निवास के अंदर हुई हत्या ने समाजवादी दिग्गज चन्द्रशेखर की 1983 भारत यात्रा में मिले जनसमर्थन और प्रभाव को नेस्तानाबूद कर दिया । परिणाम स्वरुप युवा प्रधान मंत्री राजीव गांधी के अगुवाई में कांग्रेस को लोकसभा की 542 सीटों में से 415 सीटों जबरदस्त जीत मिली । तत्कालीन राजनीति के दिग्गज अटल बिहारी वाजपेयी ,चौधरी चरण सिंह चन्द्रशेखर सिंह, हेमनंदनवती बहुगुणा सहित बड़े बड़े राजनेता चुनावी मैदान में खेत रहे । राजनैतिक पराजय कुछ पार्टियों के नेता यानी अध्यक्ष भी टिकिट बेचते हैं , कुछ के पर्यवेक्षक , इंचार्ज सचिव और स्क्रीनिंग कमेटी के मेंबर पैसा ( अच्छी ख़ासी रकम ) लेते हैं और यह पैसा सीधे इन्हीं की जेब में जाता है । यूपी के एक क्षेत्रीय दल की अध्यक्ष ही खुले आम पैसा माँगती है , लाखों से लेकर करोड़ों तक सीट में अनुकूल जातीय वोटों की गिनती के आधार पर माँग बढती घटती रहती है । यह भी तय है कि यदि किसी ने ज़्यादा देना ऑफ़र कर दिया तो टिकिट उसी का होगा जो ज़्यादा पैसा देगा और तुरंत । ऐसी सूरत में पहले वाले का पैसा कुछ महीनों बाद वापिस हो जाता लेकिन एक रिटेंशन टैक्स जैसा कटने के बाद । बिहार का एक क्षेत्रीय दल का अध्यक्ष अब किसी की नहीं सुनता और न ही हार जीत की परवाह करता है , वो करोड़ों लेकर टिकिट बांटता हैं । ऐसे तमाम दल हैं जो टिकिट बेचते हैं और जीतने की उम्मीद कम ही रहती है तो पैसा क्यों न बनाया जाये ।
यह बीमारी बड़े दलों में भी है लेकिन चुप्पा चुप्पा ही लेकिन अधिकांश नीचे के कारिंदे प्रचारक सचिव आदि ही मजा मारते हैं। हरियाणा महाराष्ट्र गुजरात कर्नाटक आंध्र तेलंगाना दिल्ली का रेट हाई रहता है और मप्र व दिल्ली के महासचिव ने बड़ी रकम तो कूटी ही पर इनकी सिफारिश पर लगातार पार्टी हारती रही ।
जब ये जीते हुये विधायक व सांसद किसी अन्य सत्ताधारी दल में जाते हैं तो अपना पूरा हिसाब चुकता कर अगले चुनाव तक का पैसा वसूल लेते हैं । जो गुटीय नेता इन सांसद विधायक भेड बकरियों को बड़े दरबार में ले जाता है वह अपना भी बड़ा हिस्सा मारता है और कई बार गरीब दलित पिछड़ों के आधी रकम भी नहीं मिलती , वे हाय हाय करते रह जाते हैं । जबकि सरकारों के नियंता बड़ा खेल अरबों में करते हैं।
मंत्री पद भी बिकने लगा है । मुझे उप्र के एक धनपशु का मालूम है जिसने पहले विधायक का टिकिट ख़रीदा और जीतने पर मंत्री पद भी ।
भारतीय लोकतंत्र में पैसे का चुनाव में प्रवेश कब हुआ ? चिढ़ना है तो चिढ़ते रहना पर 1971 में ही इसकी शुरुआत हुई केंद्रीय राजनीति से । राज्यों में इसके बाद 1985- 90 के बाद ही यह धंधा शुरु हुआ । 1967 में भी दल बदल हुआ था पर धन की भूमिका न थी ।
अब तो इंतहा से भी आगे का मामला हो चुका है ! जिसके पास पैसा उसकी सरकार बनने के ज्यादा चांस होते हैं । पैसा कहॉं से मिलता है पार्टियों को ? दो चार बड़े धन पिशाचों की कम्पनियों से । फिर दुष्चक्र शुरु होता है कि कॉरपोरेट ने जो दिया है उसका सौ गुना कमाना होता है और सरकारों की क्या औकात कि मना कर दें ?
जनहित राष्ट्रहित जातिहित पंथहित राज्यहित ये सब भाषणों की बातें हैं जिन्हें पेमेंट लेकर मीडिया से कहलवाया जाता है । जनता पिछले तीस पैंतीस चालीस बरसों से मूर्ख बनती रही है कि वो मूर्ख ही है ।

