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विचारधारा और संगठन की राह पर कब लौटेगी कांग्रेस

बरसों से कांग्रेस के सर्वशक्तिमान संगठन महासचिव के सी वेणु गोपाल अब मौका आते ही केरलम की सत्ता चाहते हैं । काँग्रेस में संगठन का सत्ता के ऊपर महत्व कभी बनाया नहीं गया जिसकी देखा देखी ही सभी उन दलों ने जो कांग्रेस से निकले हैं वे सब इसी राह पर चलते हैं । काँग्रेस सेवा दल नाम की संस्था आज से बीस बरस पहले तक सक्रिय रूप से जीवित थी । अब कहीं नाम भी सुनाई नहीं देता सिवाय कांग्रेस मुख्यालय में गांधी टोपी पहन कर कभी कभार सलामी देने के । युवक कांग्रेस खुद जननायक राहुल गांधी के बेवक़ूफ़ाना प्रयोग ने एकदम विनष्ट कर दी । राष्ट्रीय छात्र संगठन ( एन एस यू आई ) अभाविप ने ठंडी कर रखी है । महिला कांग्रेस पर मैं कुछ नहीं कहूँगा । महात्मा गांधी ने देशभर में खादी संस्थाओं का जाल और उनकी अपार सम्पत्ति बना कर सौंपी थी , वह धीरे धीरे कमजोर हुई , कांग्रेस ने उपेक्षा की और अब अधिकांशतः संघ के कब्जे में है। गांधी जी के बाद संगठन व कार्यकर्ता निर्माण किसी ने नहीं समझा और न ही किया , नेहरू जी इंदिरा जी राजीव आदि किसी ने नहीं । उल्टा संगठन निर्माण को हेय समझा कि हमारी निजी लोकप्रियता सब सम्भाल लेगी । राहुल की अस्थिर प्रकृति , प्रवृत्ति और स्वभाव संगठन के काम का नहीं ।राहुल की सहमति से ही काँग्रेस
संविधान में शराबखोरी और खादी की अनिवार्यता खत्म हुई है
सोशलिस्टों में भी कमोबेश यही हुआ लेकिन 1977 तक सोशलिस्ट नेता जो सत्तासीन भी हो जाते थे वे संगठन का बुनियादी काम कार्यकर्ता की भांति करते थे । जीवनशैली एकदम साधारण रही और कार्यकर्ता से कभी दूर नहीं रहते थे । तेजस्वी समाजवादियों में निजी अंहकार दम्भ इतना बढ़ता रहा और वे लगातार टूटते जुड़ते रहे । आज भी खुरच दो और मौका मिल जाये तो मात्र दस लोगों में आधा आधा करने में माहिर हैं। बातें बहुत बड़ी और दिल छोटा ।
कम्युनिस्ट कॉडर आधारित दल रहा इसलिये संकुचित दायरा रहा काम का लेकिन ये अपनी विचारधारा के पोंगापंथ से बाहर नहीं निकल सके और अब शायद अपनी स्थापना के सौ साल भी नहीं मना सकेंगे सिवाय सुरजीत भवन के हॉल के । बस इतने ही रहेंगें । जैसे बंगाल में सब पहले तृणमूल में और अब भाजपा में जा रहे हैं वैसे ही केरलम या अन्य राज्यों में दर्शनार्थ उपलब्ध हो सकेंगें।
भाजपा और संघ में ऐसे हजारों हैं जो आजीवन सिर्फ़ संगठन में ही काम करते रहते हैं और पार्श्व में रह कर । यह दीगर बात है कि वे भी आजकल एक दशक से सब सुखसुविधा सम्पन्न होकर करते हैं । जीवन शैली आभिजात्य और सुविधा पसंद होकर बड़ी शीघ्रता से कांग्रेस कुसंस्कृति की नक़ल कर रहे हैं । संघ कॉडर निर्माण करता है उनमें अपना विचार ( जैसा भी है ) वह इंजेक्ट करता है और बचपन से ही । साथ ही उनमें से फिल्टर कर भाजपा और अन्य आनुषंगिक संगठनों में भेजता है। भाजपा को सत्ता में लाने का महत्वपूर्ण काम संघ इसलिये करता है कि अपना विचार व ऐजेंडा लागू करा सके । जनराजनीति और संगठन निर्माण दोनों अलग अलग काम हैं भाजपा व संघ में लेकिन सब संगठन का आदेश मानते हैं । गत एक दशक में संघ की पकड़ ढीली जरूर हुई है कि पुराना एजेंडा लागू करना पहले जरूरी माना गया है । मोदी शाह भी इसीलिए बर्दाश्त किये जा रहे हैं । लेकिन इस दौरान कार्यकर्ता का चरित्र ईमानदारी सच्चाई बहुत तेजी से तिरोहित हुई है । संघ में चिंता होगी इस बात पर लेकिन अब यह चीज हाथ से निकल चुकी है । एकनिष्ठ कार्यकर्ता भी अब शायद पुनर्विचार न करने लगे हों !
मत भूलिये कि संघ अपनी सरकारों का उचित उपयोग संगठन के भवन साधन और सभी सरकारों संस्थाओं में प्रवेश कर उनपर कब्जा करने में करता है । अपने समर्थकों व स्वयंसेवकों को विभिन्न पदों पर पहुँचवाता है चाहे उनमें अनुकूल योग्यता न भी हो । कोई अन्य पार्टी इस काम को कभी तरजीह नहीं देती । तमाम तरह की सिविल सर्विस नौकरशाही , न्यायपालिका , खबरपालिका , सेना पुलिस सभी सरकारी अंगों में अपनी पैठ बना चुका है संघ जो चुपचाप अपना काम करते रहते हैं । यह पैठ पहले काँग्रेस राज में होती रही और अब तो खुलकर होनी है ।
मुकाबला करने के लिये तीन बातें ज़रूरी हैं – पहला संगठन , दूसरा विचार बल्कि विचारधारा और तीसरा लक्ष्य के लिये प्रतिबद्धता । तीनों पर कौन कहॉं ठहरता है इस पर विचार करिये !
( शिक्षाविद विचारक  रमाशंकर सिंह की फेसबुक वॉल से )