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बार काउंसिल चुनाव 2026: सवा लाख की ‘एंट्री टिकट’ या वकीलों का लोकतंत्र?

  सुप्रीम कोर्ट की मुहर है, लेकिन सवाल बाकी हैं

कल्पना कीजिए – भोपाल, इंदौर या जबलपुर की किसी तहसील अदालत में एक युवा वकील सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक मुकदमे लड़ रहा है। घर का किराया, क्लाइंट का बिल, बच्चों की फीस… और अब बार काउंसिल चुनाव लड़ने के लिए नामांकन फीस? **1,25,000 रुपये** – नॉन-रिफंडेबल! जीतो या हारो, पैसा बार काउंसिल के खाते में।
12 मई 2026 को मध्य प्रदेश बार काउंसिल के चुनाव निश्चित हो चुके हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने 25,000 रुपये की पुरानी फीस को पांच गुना बढ़ाकर सवा लाख कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में इस फैसले को मंजूरी दे दी और साफ कहा – “हाई कोर्ट्स इस फीस को चैलेंज करने वाले याचिकाओं में दखल न दें।” चुनाव की लागत बहुत ज्यादा है, इसलिए फीस वापस नहीं होगी। फैसला अंतिम।

एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और लोकतंत्र का मूल मंत्र

बार काउंसिल राज्य की “सेल्फ रेगुलेटिंग बॉडी” है। सेक्शन 8 के तहत चुनाव होते हैं। BCI ने नियम बनाया – फीस बढ़ाओ। सुप्रीम कोर्ट ने उसे मंजूर किया। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय करने का अधिकार) क्या कहते हैं? क्या एक फीस, जो जिला-तहसील स्तर के 90% वकीलों के लिए “दूर का सपना” है, वास्तव में समान अवसर दे रही है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “चुनाव महंगा है।” सही। लेकिन क्या कभी किसी अध्ययन में आंकड़ा निकाला गया कि मध्य प्रदेश के 1.25 लाख से ज्यादा वकीलों में से कितने गरीबी रेखा के नीचे या EWS कैटेगरी में हैं? वकीलों के लिए EWS कार्ड? हंसिए मत, ऐसा कोई प्रावधान नहीं! बार काउंसिल चुनाव में आरक्षण तो SC/ST/OBC के लिए भी नहीं है (सिवाय विकलांग वकीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में छूट दी थी)।
अमीरों की बार या वकीलों की बार?
सुप्रीम कोर्ट में बैठे वकीलो के लिए 1.25 लाख शायद “चाय-पानी” हो, लेकिन ग्वालियर की तहसील अदालत में प्रैक्टिस करने वाला वकील, जो महीने में 15-20 हजार कमा रहा है, उसके लिए यह “अंतिम निर्णय” ही है। परिणाम? 90% वकील चुनाव लड़ने का ख्याल तक नहीं देंगे। प्रतिनिधित्व सिर्फ उन अमीर वकीलों का होगा जो बड़े शहरों में चैंबर चलाते हैं।
क्या यह “लोकतंत्र” है? बार काउंसिल का मकसद तो सभी वकीलों का हित संरक्षण है – चाहे वे गरीब हों या अमीर। अगर बहुमत वकील ही मैदान में नहीं उतर सकते, तो प्रतिनिधित्व कहां से आएगा?

अब क्या करें? कानून के दायरे में ही समाधान!

सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम है। फीस कम नहीं होगी। लेकिन **वोट का अधिकार** अभी भी आपके पास है!
यहां रोचक ट्विस्ट है –
हलफनामा वाला फॉर्मूला: प्रत्याशी से हलफनामा मांगिए। लिखित वादा करवाइए कि –
1. अगले कार्यकाल में नामांकन फीस को यथासंभव कम करने के लिए BCI के पास प्रस्ताव लाएंगे।
2. गरीब वकीलों के लिए मेडिकल इंश्योरेंस, पेंशन स्कीम, लीगल एड प्रैक्टिस वकीलों को प्रोत्साहन।
3. जिला-तहसील स्तर के वकीलों की समस्याओं (कोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, वेतन भुगतान में देरी) पर प्राथमिकता।
जो प्रत्याशी हलफनामा नहीं देगा या पुरानी कार्यकारिणी का हिस्सा है (जिसने फीस बढ़ाने का प्रस्ताव पास किया), उसे विदाई दे दीजिए।
– **एकजुटता का कानूनी रास्ता**: वकील संघों के माध्यम से प्रस्ताव पास कीजिए। अगले चुनाव में या BCI की मीटिंग में यह मुद्दा उठाइए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है “फीस बढ़ाई गई”, लेकिन कभी भी भविष्य में रिव्यू का दरवाजा बंद नहीं किया।

अंत में एक मजेदार सवाल

अगर बार काउंसिल “वकीलों की मां” है, तो क्या मां अपने 90% बच्चों को स्कूल (चुनाव) में एंट्री देने से पहले इतनी भारी फीस ले सकती है?
12 मई 2026 को वोट देते समय याद रखिए – आप सिर्फ प्रत्याशी नहीं चुन रहे, आप अपने प्रतिनिधित्व का भविष्य चुन रहे हैं। हलफनामा लीजिए, वादा लिखवाइए, और फिर वोट दीजिए।
क्योंकि कानून की किताबों में लिखा है – “Justice must not only be done, but must also be seen to be done.”
वकीलों के लोकतंत्र में भी यही लागू होता है।
 लेखक के निजी विचार-राजकुमार जैन एडवोकेट ,संस्थापक सदस्य अभिभाषक समन्वय समिति ग्वालियर